
Wednesday, August 4, 2010
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कमंडल और खड़ाऊं से लैस एक ऋषि ब्लॉगिया दुनिया में अवतरित हो गया है। चूंकि खड़ाऊं आम चल रहे हैं तो बचा कंमडल में श्राप या आशीर्वाद का जल। अब यह तो मनुष्य की मनुष्यता या दुष्टता पर निर्भर करेगा कि किसे क्या मिलेगा। कार्टूनों की यह बौछार नेताओं और नौकरशाहों के कर्म आचरण पर निर्भर करेगी..
3 comments:
हा हा !! बेहतरीन, सटीक, बहुत खूब. देश में खेल के नाम पर चल रहा एक नंगा सच
सिर्फ सात शब्दों में सारी बात ...
बहुत बढ़िया ....
दुर्भाग्य है हमारा.... इस देश का खेल है निराला...
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