
Monday, November 2, 2009
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कमंडल और खड़ाऊं से लैस एक ऋषि ब्लॉगिया दुनिया में अवतरित हो गया है। चूंकि खड़ाऊं आम चल रहे हैं तो बचा कंमडल में श्राप या आशीर्वाद का जल। अब यह तो मनुष्य की मनुष्यता या दुष्टता पर निर्भर करेगा कि किसे क्या मिलेगा। कार्टूनों की यह बौछार नेताओं और नौकरशाहों के कर्म आचरण पर निर्भर करेगी..
3 comments:
हाय!! क्या समाज सेवा की भावना है...
भैये मास्टरों के कोई विशेष खुन्नस ना हो तो हम आपके कार्टूनों के नियमित ग्राहक बन जाएँ? वैसे आपका प्रोफाइल परिचय एक मास्टर होने के नाते दारा रहा है!!!!
दारा= डरा
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